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एक अकेला इस शहर में, रात में और दोपहर में...

"एक अकेला इस शहर में, रात  में और दोपहर में.… आबोदाना ढूंढता है, आशियाना ढूंढता है।"

इस गाने को जब पहली बार सुना तब इसका मतलब समझ नहीं आया था। बहुत छोटी थी तब और आज भी मेरे लिए पुरे गाने के बोल का वह मतलब नहीं, जो शायद शायर का हो। ये ख़ूबसूरती होती है हर गीत की। जो भी सुनता है, उसे अपने मन मुताबिक़ समझता है, महसूस करता है। हर माहौल और उससे जुड़े सवालों को हम अपने तरीके से सोचते हैं। अपने खुद के आईने में देखते हैं। कैसे भूल सकती हूँ साहिर लुधयानवी की लिखी ग़ज़ल (कभी खुद पे कभी हालत पे रोना आया.…) की एक लाइन  "कौन रोता है किसी और की ख़ातिर ऐ दोस्त, सबको अपने ही किसी बात पे रोना आया..... "  खूबसूरत भी, ज़हीन भी।  "एक अकेला इस शहर में, रात  में और दोपहर में.…" मेरे लिए भी ऐसा ही है।    

पहले ऐसी सब बातों पर मेरा ध्यान न जाता था पर शायद उम्र और तज़ुर्बे का तक़ाज़ा है की इस तरह के कई सवाल अनायास मेरे ज़हन में आते है। जब तक इनको टटोल न लूं,  कुछ वक़्त  इनके साथ गुज़ार न लूं , ये जाते नहीं। या यूँ कहूँ  साथ नहीं छोड़ते। अकेला नहीं रहने देते। 

अकेला इंसान क्या तभी हो सकता है जब आपके साथ कोई न हो? अकेलापन क्या तभी आता है जब सब चले जाते हैं? ये जरूरी तो नहीं। मैंने बहुत दफ़ा अकेलेपन को एक भीड़ के बीच में महसूस किया हैँ। इंसान परिवार-दोस्तों के बीच भी तो अकेले हो सकते हैं? शादी शुदा ज़िन्दगी में क्या अकेलापन नहीं हो सकता? ऐसे बहुत रिश्ते होते हैं जहाँ आप अकेला खुद नहीं होते, वहां दूसरे इसका इंतज़ाम करते हैं। और ऐसे बहुत से रिश्ते और लोग होते हैं जो अपने होने से इस ख़ालीपन को ज्यादा बढ़ा देते हैं। कहीं दूसरे आपको अकेला  करते हैं। कहीं आपकी ख़ुद की सोच आपको अकेला करती है। कभी कुछ लोग हज़ारों मील दूर होने पर भी आपके अकेलेपन का इंतज़ाम कर देते हैं। कई बार तो लोग कुछ इंच दूर होकर भी अकेला कर देते हैं।    

मसला मेरे लिए अकेलापन कभी नहीं रहा है। आख़िर खुद को झेलना या खुद से निभाना कितना मुश्किल हो सकता है? सोच मेरी हमेशा आकर अटकती है की हम उस ख़ालीपन का क्या करते हैं? क्यों हमेशा हर खाली वक़्त को किसी ना किसी सोच या याद या इंसान से भरने में लगे रहते हैं? क्यों अकेला होना एक तरह का श्राप समझा जाता है? आखिर खुद से अपना परिचय अकेले में ही तो होता है। सारे परदे, सारे दिखावे, सारी शिकायतें, सारा इतमिनान अकेलेपन में ही तो दिखाई देते हैं। अपने आने की आहट  भी इसी समय आती है। अपने होने का अहसास भी तो अकेले में ही आता है। एक उम्र गुज़र जाती है ख़ुद को समझने में। और उसमें दूसरों को भी शामिल कर लें तो शायद ये उम्र भी कम पर सकती है। फ़िर क्यों न कम से कम एक इंसान को समझने की कोशिश करें ? ख़ुद को।

ख़ुद से अपनी पहचान कराने के लिए बहुत ज़रूरी है, हम जब बड़े होने लगते हैं तब हर मोड़ पर मुड़कर पीछे ज़रूर देखना चाहिए। क्या छूटा, क्या साथ चल रहा है, हँसी और आँसू की आवाज़, सुख और दुःख का लेखा जोखा। क्यूंकि इस सब में सबसे ख़ूबसूरत बात ये है की इन्हें देखते हुए हल्की सी मुसकान ज़रूर आ जाती है। गुज़रा हुआ वक़्त चाहे अच्छा बीता हो या बुरा, गुज़र जाने के बाद अच्छा ही लगता है। शायद आपने भी महसूस किया हो। लोग कहते हैं बीता हुआ कल भूल जाना चाहिए, एक सुनहरे भविष्य  लिए। पर मेरा मानना है की मेरा आज मेरे बीते हुए वक़्त की मज़ार पर खड़ा है। फिर मैं ख़ुद अपने हाथों से अपने पाव के नीचे की ज़मीन कैसे खींच सकती हूँ ? और ये कहाँ तक मुनासिब है ? मन हो या ना हो, मेरा अतीत एक अहम हिस्सा है मेरे आज के वज़ूद का। और हमारा माज़ी हमेशा बुरा तो नहीं होता? बहुत ऐसे लोग हैं जिनको हम एक सुन्दर कल नहीं दे सकते, फिर हमें क्या हक़ बनता है उनसे उनका अतीत छीनने का? ये सारे अहसास हमें अकेले  होने पर ही मिलते हैं। 

क्या अकेलेपन के फ़ायदे समझने के लिए ये ज़रूरी है की हम एक नयी दुनिया तैयार करें ? मेरे हिसाब से नहीं। हर इंसान के अंदर एक ऐसी सुकून वाली दुनिया पहले से ही मौज़ूद है। सोचने वाली बात ये है की जिस शांति और सुकून की दुनिया की खोज हम उम्र भर करते हैं, वही शांति, सुक़ून  सबसे पहले खोते हैं इस खोज में। फिर क्यों करें ऐसी कोशिश ? क्या इस अकेले के सफ़र को बिना किसी फ़ायदे या नुक़सान के तराज़ू में तोले हुए तय नहीं किया जा सकता? जब हम जीवन रास्ते पर चल रहे होते हैं, उस वक़्त  क्या खोया, क्या पाया नहीं सोचना चाहिए।  पर जब कभी, कहीं इतमीनान से बैठो तो ये ज़रूर सोचो की जो भी मुझे मिला इस सफ़र के दौरान, उसका मैंने सही उपयोग किया की नहीं ? वो कुछ  भी हो सकता है - परिवार, दोस्त, जीवन साथी, बच्चे, अच्छे मौके, बुरा वक़्त, कठिन फ़ैसले, आसान सी ज़िन्दगी।  कुछ भी। हो सकता है शायद इन में से बहुत सी चीज़ें और लम्हे ऐसे हो जो क़यामत तक सुक़ून और ख़ुशी देने के लिए काफ़ी हों। जीवन के हर मोड़ पर अपना नहीं ढूंढना चाहिए, अपनापन और ज़हीन अहसास रखने वाले बन्दे की तलाश होनी चाहिए।

और देखा जाए तो अकेले होने में क्या बुराई है ? कोई साथ  दे या ना दे। अपना साथ हर मुक़ाम को हासिल करने के लिए, हर रास्ते को आसान करने के लिए काफ़ी होता है। सिर्फ़ पहले कदम उठाने की देर है, रास्ते ख़ुद-ब-ख़ुद आसान हो जाएंगे। हर राह का एक अपना मुस्तक़बिल होता हैं. एक मंज़िल होती है। और हर रास्ता किसी न किसी मोड़ पर किसी और रास्ते से मिलता ज़रूर है। उस मोड़ पर बैठ कर हिसाब कर लेना और जो अपना रास्ता अच्छा ना लगे तो उसे बदल लेना। याद रखने वाली बात ये है की हम चाहे रास्ते कितने भी बदलें, पर उस पर चलने वाला मुसाफ़िर तो वही रहता है। अकेला। इस लिए ख़ुद से अपनी पहचान होना बहुत ज़रूरी है, साथ के। लिए। ताकि ज़िन्दगी का सफ़र एक अच्छे जाने पहचाने इंसान के  साथ गुज़र सके।  

माँ 

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