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एक पल

सुक़ून के एक पल की हर किसी को तलाश है। पर न जाने ये क्यों मिलता नहीं। हर किसी को शांति की खोज है। अंदर बाहर कहीं तो इस से मुलाक़ात हो जाऐ। बैठ कर सुख-दुःख की दो चार बातें कर लें उसके साथ। बस वो एक पल एक बार हाथ लग जाए, फिर कहीं जाने नहीं दूँगी। इस चैन की खोज में अपने दिन रात के चैन को खो दिया है कहीं मैंने। हँसी भी आती है अपने इस सोच पर। फ़िर ध्यान आता है शायद इसी को जीवन कहते हैं।जब हम बोलते हैं पर न कोई सुनने वाला हो या समझने वाला हो तो ऐसा वक़्त भी आता है जब इंसान चुप हो जाता है। दिल बोलना तो बहुत चाहता हैं पर फिर भी जुबां चुप रहती है की कहीं कोई तूफ़ान नहीं उठ जाये। कुछ कहने की चाह नहीं रह जाती।अक्सर जिस उम्मीद या चीज़ के पीछे दौड़ के थक जाने पर बैठ जाती हूँ, नज़र उठा कर देखती हूँ तो वही चीज़ ख़ुद -ब-ख़ुद आराम से चल कर मेरी तरफ आती दिखाई देती है। उसकी चाल में कोई बेचैनी या जल्दी पहुँचने की परेशानी नहीं दिखाई देती। फिर मैं क्यों परेशान हो जाती हूँ इसके लिए?

किसी ने सच ही कहा है की अपने जीवन को सफ़ल समझने के लिए मनुष्य को पूरी ज़िन्दगी का लेखा-जोखा देने की आवयश्कता नही पड़ती। एक पल काफ़ी है महसूस करने के लिए की मैंने ज़िन्दगी कैसे बिताई। खोना-पाना, हँसना-रोना, सुख़-दुःख, अच्छा-बुरा, ये सब एक छण से ही तो जुड़ा हुआ है। जीवन की सबसे प्यारी और महत्वपूर्ण यादें हमेशा किसी ना किसी पल से जुड़ी होती हैं। अगर देखें तो जीवन एक सिलसिला है अनगिनत पलों का अन्यथा और कुछ भी नहीं। ये एक-एक पल जुड़कर हमारी जीवन की कहानी बनती  है। फ़िर भी हम न जाने किस तरह के जीवन की आस में अनगिनत पलों को खोते जा रहे हैं? किस ज़िन्दगी का ख़्याल हमें रात को सोने नहीं देता, दिन भर परेशान करता रहता है? किस कश्मकश से जूझती रहती हूँ? क्या ये सब सिर्फ बातें हैं और इनको यही रहने देना चाहिए? क्या ऐसा कोई हो सकता जिसकी दुनिया आपके साथ शुरू हो और आप पर ही ख़त्म हो? तपते हुए दिल के ज़ख्मो पर मलहम की तरह बरसे? शायद किसी पल में इसका जवाब भी मिल जाये कहीं। 

हमें ये पल कितने नसीब से मिलते हैं इसका एहसास उस पल के गुज़र जाने के बाद होता है। कभी-कभी तो शायद एक सदी बीतने जाने के बाद हमें उस पल के खो जाने का अफ़सोस होता है। पर दुःख के कुछ एक पल ऐसे भी होते हैं जो एक युग के सामान प्रतीत होते हैं। शायद ही कोई होगा जिसने ऐसा महसूस नहीं किया होगा फिर भी हम न जाने किस स्वर्ग को पाने के लिए दौड़ते रहते हैं। हमारे हित में सोचने वाले अपने भी जब पीछे से आवाज़ लगाते हैं, हमें कुछ सुनाई नहीं देता। हम एक के बाद दुसरे मंज़िल की तलाश में चलते रहते हैं। जायगे कहाँ ये पता नहीं होता, न रास्ते की ख़बर होती है, न मंज़िल की फिर भी चलते चले जा रहे हैं।लगता है जैसे हर बंधन, हर रिश्ते को तोड़ कर कहीं पहुँच जाए जहाँ सुक़ून हो। पर ये कभी सोचा है की बिना किसी साथी या हमसफ़र के कोई मंज़िल मायने नही रखती, कोई सफर ख़ूबसूरत नहीं लगता, कोई पल पूरा नहीं लगता। इस सुक़ून में सिर्फ मैं और मैं ही की जगह होती है। ऐसा क्यों होता है की हमें शांति तो चाहिए होती है पर ज़्यादा वक़्त तक ये रास नहीं आती। हम फिर किसी का साथ ढूंढने लगते हैं। जीवन के इस मेले में हम अकेले घूम नहीं सकते। खो जाने का डर हमेशा रहता है। अंतः हमें मिट्टी में ही मिलना है तो उस पल से पहले क्यों ख़ुद को हर पल मारते हैं?   


माँ

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