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"वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड़ पराई जाणे रे,
पर दु:खे उपकार करे तो ये मन अभिमान  आणे रे।"

"सकल लोकमां सहुने वंदे निंदा  करे केनी रे,
वाच काछ मन निश्चल राखे धन धन जननी तेनी रे।"

"समदृष्टि ने तृष्णा त्यागीपरस्त्री जेने मात रे,
जिह्वा थकी असत्य  बोलेपरधन नव झाले हाथ रे।"

"मोह माया व्यापे नहि जेनेदृढ़ वैराग्य जेना मनमां रे,
रामनाम शुं ताली रे लागीसकल तीरथ तेना तनमां रे।"

"वणलोभी ने कपटरहित छे, काम क्रोध निवार्या रे,
भणे नरसैयॊ तेनु दरसन करतां, कुल एकोतेर तार्या रे ॥"


ये प्रार्थना पंद्रवी सदी में कवी नरसिंह मेहता द्वारा लिखी गयी थी।  इस रचना का पाठ गांधीजी की संध्या प्रार्थना सभा का एक अभिन्न अंग था। आज तक मैं सिर्फ़ इसे सुनती थी और पहली दो पंक्तियों के अतिरिक्त मुझे कुछ समझ नहीं आता था। हमेशा लगता था की ये कैसी हिंदी है की मेरे समझ के परे है। शब्द अत्यंत मीठे लगते थे। मन को शांति भी मिलती, इस लिए रोज सबेरे सुनती थी। 


कल गाँधी जयंती के दिन मैंने इसे खोजना शुरू किया। तब यह तथ्य सामने आया की ये गुजरती में है और इसी कारणवश इसकी पंक्ति मुझे समझ नही आती थी। फ़िर इस समस्त कविता का मैंने अर्थ ढूँढा। जब मैं अर्थ जानने का प्रयास कर रही थी तो पहली बार स्वयं ये महसूस किया की किसी भी रचना का आनंद लेने के लिए उसके शब्दों का अर्थ जानना या भाषा का ज्ञान होना अनिवार्य नहीं है। जो सुंदर है, जो मार्मिक है, जीवन और आत्मा को छू जाती है, वह रचना कहीं की भी हो सकती है। ख़ास कर जो ईश्वर और आत्मशांति से सम्बंधित हो। 

इस रचना के पहले की दो पंक्तियों का अर्थ है की ईश्वर का जन वही है जो दुसरे मनुष्य का दुःख समझ सकता है और दूसरों के दुःख में मदद करने को निम्न नहीं समझता है। अगली दो पंक्तियों का अर्थ है की वैष्णव जन वो है समस्त लोक के प्राणियों का आदर करता है, किसी की निंदा नहीं करता और मन, बोल,सोच सब में निश्छल है। ऐसे मनुष्य की जननी सचमुच धन्य है। अगली दो पंक्तियों का अर्थ है ऐसे व्यक्ति ने स्वयं तृष्णा का त्याग किया है। पर-स्त्री माँ के सामान है उसके लिए। जीभ अगर थक भी जाए तो झूठ नहीं बोल सकता है  और दुसरे के धन हाथ आने की लालसा नही होती है उसमें। अगली दो  पंक्तियों का अर्थ है, इस इंसान के भीतर मोह माया का वास नहीं है और वैराग्य ही जीवन का सार है। राम नाम में विलीन है और तीर्थ स्थानों में वास है। अंतिम दो पंक्तियों में कवि कहतें हैं की ये मनुष्य न लोभी होते हैं, ना कपटी, काम क्रोध का त्याग किया है और ऐसे वैष्णव मनुष्य धन्य है, पूज्य हैं और अपने साथ अपने समस्त कुल का उद्धार करते हैं।

अत्यंत सुन्दर और हृद्य को शांति देने वाली रचना है। मुझे तो लगता है की आजकल के विद्यालयों में इसका शायद ही पाठ होता होगा। देखा जाए तो हर प्रार्थना का सार एक ही होता है, लक्ष्य भी एक ही है पर अर्थ भिन्न है हर प्राणी के लिए। कौन से बोल, कब किस वक़्त किसी व्यक्ति को अंधकार से उजाले में ले जाए ये कहा नहीं जा सकता है। उम्मीद की एक छोटी सी किरण भी किसी जीवन को पार लगाने की शक्ति रखती है। आवयश्कता विश्वास की है। एक क्षण भी पुरे भाग्य को उजागर करने की क्षमता रखता है। उस समय आने  का इंतज़ार मत करो। उस पैदा करो। विश्वास में सब कुछ है, बहस में कुछ नहीं।

माँ





   

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