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"तेजस्वी सम्मान खोजते नहीं गोत्र बतलाके,
पाते हैं जग से प्रशस्ति अपना करतब दिखलाके।"

"मूल जानना बड़ा कठिन है नदियों का, वीरों का,
धनुष छोड़कर और गोत्र क्या होता रणधीरों का?
पाते हैं सम्मान तपोबल से भूतल पर शूर,
'जाति - जाति' का शोर मचाते केवल कायर, क्रूर।"

                                             - रामधारी सिंह दिनकर (प्रथम सर्ग, 'रश्मिरथी')

जन्म और गोत्र आपको जीवन में वहीँ काम आ सकता है जहाँ का समाज कुंठित विचार धारा के अधीन है। जिस समाज में छमता को महत्व न देकर जाति या आर्थिक उपलब्धियों (चाहे वह किसी भी प्रकार से अर्ज़ी गयीं  हो) को महान मानते हैं , वहां कभी भी ज्ञान को उसका उचित स्थान देना बहुत कठिन है। सदियों से इस मानसिकता ने ना सिर्फ हमारे देश और समाज को निम्न कोटि का बनाया है, बल्कि समुचित पीढ़ी को ग्रसित किया है। यह कोई आज की रीती नहीं है। महाभारत में भी कृपाचार्य और द्रोणाचार्य ने कर्ण को उसके हीन मूल के कारण रंग भूमि में अर्जुन की बराबरी करने से रोका था। जब ऐसे महारिषी इस तरह की विचारधारा से ग्रसित थे तो सामान्य व्यक्ति की क्या बिसात है। उस छण  दुर्योधन ने कर्ण का हाथ थामा था और उसे 'अंगेश' घोषित किया था।  प्रथम सर्ग में दुर्योधन ने कर्ण के पक्ष में आकर भीम से कहा था -

बड़े वंश से क्या होता है, खोटे हों यदि काम? नर का गुण उज्जवल चरित्र है , नहीं वंश-धन-धाम"

"रश्मिरथी" में कर्म और उज्जवल चरित्र की महत्ता का अति सुन्दर और सटीक व्याख्यान किया गया है। सबसे उच्च स्थान किसी भी समाज में इन्ही का होना चाहिए।यह मूल मंत्र जिसके जीवन का सार बन जाये उसे सफल होने से कोई नहीं रोक सकता है। बहुत पुरानी कहावत है की आपका धन जा सकता है, आपका स्वस्थ्य गिर सकता है, आपके अपने बीच मझधार में आपको छोड़ सकते हैं, परन्तु ज्ञान हीं एक ऐसी अर्जी हुई निधि है जो हमेशा आपके साथ रहती है। ज्ञान हमें आत्म-सम्मान से जीवनयापन का मार्ग दिखलाता है। मेरी माँ हमेशा सीखाती थी की जिस वृक्ष में जितना अधिक फल होता है, वह उतना झुका होता है। ज्ञान हमें नम्रता का पाठ पढाता है ना की अभिमान का। जीवन छोटा हो सकता है पर ज्ञान की लालसा कभी भी कम नहीं होनी चाहिए। और हमेशा याद रखना चाहे राह कितना भी कठिन क्यों न हों, ज्ञान एक ऐसा दीपक है जो हर अंधकार को चीरने की छमता रखता है। कितना गहरा भी अँधेरा हो, ज्ञान की एक छोटी सी लौ भी इसे दूर करने में सक्षम है। ये एक ऐसा औज़ार है जो समस्त जीवन-राह के सारे काँटों को निकाल फ़ेंक सकने की शक्ति रखता है। धैर्य भी इसी का एक रूप है। विधि का विधान भी तभी तुम्हारे पक्ष में होगा जब कर्म प्रबल होगा। ज्ञानअर्जन को अपना लक्ष्य बनाओ और कर्म को अपना धर्म।

जहाँ तक मुझे ज्ञात है हमारे शाश्त्रों में जीवन काल को पाँच आश्रमों में विभाजित किया गया है -
सैसव ( बालपन); ब्रह्मचर्य (विद्यार्थी जीवन); गृहस्थ (विवाह और पारिवारिक जीवन); वंप्रस्त (मोह माया का त्याग) और; सन्यास (मोक्ष प्राप्ति का मार्ग)। हर आश्रम की अपनी सीमा और दायित्व है। किसी भी परिस्तिथि में इनका उलंघन नहीं करने का अथक प्रयास करना चाहिए। तुम ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश कर चुकी हो। इसके मूल और महत्व को समझों।

ब्रह्मचर्य आश्रम में हमें ज्ञान अर्जित करने के लिए कहा गया। इस आश्रम में मनुष्य का धेय्य मन, शरीर और बुद्धि के सयंमित विकास की ओर होना चाहिए। इस कल में किया गया परिश्रम आगे के जीवन का आधार होता है। मेरी माँ हमेशा हम सब बच्चों को एक संस्कृत का श्लोक सुनाती थी जिसमें एक विद्यार्थी के पाँच गुणों का वर्णन है - "काग चेष्टा, स्वां निंद्रा, बको ध्यानं,  त्तेईव च अल्पहारी, गृह त्यागी विद्यार्थी पांच  लक्षणम"  अर्थाह्त विद्यार्थी को कौए की तरह हर परिस्थिति में अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए अथक प्रयास करते रहना चाहिए , कूकुर की भांति पतली नींद होनी चाहिए, बगुले की तरह ध्यान एकाग्रचित होना चाहिए, भूख के अनुसार भोजन ग्रहण करना चाहिए एवं संसारिक जीवन में लुप्त नहीं होना चाहिए। इन सब गुणों के माध्यम से हीं ज्ञान सही मायनों में अर्जित हो सकता है। यह समय फिर वापस नहीं आएगा।

आज के इस जीवन में हमें सब कुछ करने की जल्दी रहती है। पर मैं तुमसे ये आशा रखती हूँ की तुम अपनी सीमाओं को पहचानोगी और उनका आदर करोगी।


माँ


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