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नई उम्र की नई फ़सल

प्राय: जब सोचने बैठती हूँ तो जीवन का अभिप्राय इतने वर्षों के बाद भी कुछ कम ही समझ आता है। हर नया दिन अपने साथ नित् नए सपने बुनने की क्षमता और पुराने घावों को मिटाने की हिम्मत लेकर आता है। अब ये हमारे ऊपर निर्भर करता है की हम इसका उपयोग किस प्रकार करें।   आज की युवा पीढ़ी को देखती हूँ तो लगता है की ये लोग जीवन के यथार्थ से कितने परे हैं। यह बड़े शहरों में अत्यधिक है पर छोटे शहरों में भी धीरे धीरे अपनी जड़ें बना रहा है। कहते हैं की किसी भी समाज का साहित्य, कला, चलचित्र इत्यादि उस समाज का प्रतिबिम्ब होते हैं। आज हमारे भारतीय समाज को अगर देखें तो ज्ञात होगा की यह कथन कितना सटीक है। प्रगतिशील होने का यह तात्पर्य तो नहीं हो सकता की हम अपने मूल मान्यताओं या संस्कारों की तिलांजलि दें।  हर माता-पिता इसी कोशिश में रहतें हैं की कैसे अपने बच्चे को जीवन के कटु सत्यों से दूर रखें। इस सोच में कोई त्रुटी नहीं है परन्तु हम एक बहुत आवश्यक तथ्य को भूल जातें हैं की एक उम्र के बाद उन्हें जीवन की वास्तविकता से दूर रख कर हम उन्ही का अनहित कर रहे...

नर हो न निराश करो मन को

नर हो न निराश करो मन को - मैथिलीशरण गुप्त नर हो न निराश करो मन को कुछ काम करो, कुछ काम करो जग में रहके निज नाम करो यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो कुछ तो उपयुक्त करो तन को नर हो न निराश करो मन को । संभलो कि सुयोग न जाए चला कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला समझो जग को न निरा सपना पथ आप प्रशस्त करो अपना अखिलेश्वर है अवलम्बन को नर हो न निराश करो मन को । जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो उठके अमरत्व विधान करो दवरूप रहो भव कानन को नर हो न निराश करो मन को । निज गौरव का नित ज्ञान रहे हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे सब जाय अभी पर मान रहे मरणोत्तर गुंजित गान रहे कुछ हो न तजो निज साधन को नर हो न निराश करो मन को ।
" धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय। माली सीचे सौ घड़ा, रितु आये फल होय।" "बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोय। जो दिल ढूँढा आपना, मुझसे बुरा ना कोय।" "जो बड़ेंन  को लघु कहे, नहीं रहीम घट जाए। गिरिधर मुरलीधर कहे, कछु दुःख मानत नाय।" "कमला थिर न रहीम  कही, यह जानत सब कोय। पुरुष पुरातन की वधु, क्यों ना चंचला होय।" " रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय। टूटे से भी ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय।" "साईं इतना दीजिये जा में कुटुम्भ समाय। मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु ना भूखा जाय।" " पूत कपूत तो क्यों धन संचय। पूत सपूत तो क्यों धन संचय।" "आवत ही हर्षे नहीं नैनन नहीं सनेह। तुलसी तहाँ ना जाइए कंचन बरसे मेह।" " जब काल मनुज पर छाता है। पहले विवेक मर जाता है।"     "पत्थर पूजे तो हरी मिले, तो मैं पूजूं पहर, उससे तो चक्की भली जो पिस खाए संसार।"  "“तीन चीजें अधिक समय तक नहीं छुपी रह सकती: सूरज, चंद्रमा और सत्य। ” " कंकर पत्थर जोड़ के मस्जिद दियो बनाये, ता पर ...

मेरी ज़मीन और मेरा आसमान...

"कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता कहीं ज़मीन तो कहीं आसमान नहीं मिलता.... ......तेरे जहाँ में ऐसा नहीं कि प्यार न हो जहाँ उम्मीद हो इसकी, वहाँ नहीं मिलता"                                                               - (निदा फ़ज़ली के ग़ज़ल की कुछ पंक्तियाँ ) किसी भी इंसान को जीने के लिए किन चीज़ों की ज़रुरत हो सकती है? साँस, ज़मीन और आसमां। पहला तो ख़ुदा पैदा करते के साथ दे देता है पर बाकी दो को हासिल करने में सारी उम्र निकल जाती है। कमर टूट जाती है पर दोनों साथ कभी नहीं मिलते। हर पल ज़िन्दगी ये अहसास दिलाती है की कितना मुश्किल है मिलना "अपनी ज़मीन और अपने आसमान" का। एक साथ।           जब तक माँ-बाप की ड्योढ़ी पार नहीं करते तब तक लगता है सब अपना है। उनका असमान हमारा होता है, उनकी ज़मीन हमारी होती है। फ़िर वो वक़्त आता है जब हम एक महफू...

Is a woman human....

मुंशी प्रेमचंद की मनोरमा और  निर्मला , भगवतीचरण वर्मा की चित्रलेखा , आचार्य चतुर्सेन की वैशाली की नगर वधु , गोली  , शरतचंद्र की देवदास और  परिणीता, तुलसीदास   की सीता और महर्षि व्यास की द्रौपदी, कुंती और गांधारी  और ऐसी ही अन्य कई विख्यात रचनओं में स्त्री को ऐसे रूप में प्रस्तुत किया गया है जिसकी तुलना आम जीवन से नहीं की जा सकती। स्त्री के गुणों-अवगुणों को इस तरह से दर्शाया गया की अगर कोई सामान्य नारी उन पात्रों से अपनी तुलना करे तो उसे उसकी झलक अपने जीवन में कहीं नज़र नहीं आएगी। नारी के रूप को और भावनाओं के दो छोरों पर दिखाया गया है। ज्ञान, दया और त्याग अगर एक छोर  है तो ईर्ष्या और प्रतिशोध दूसरा छोर है। क्या स्त्री इन दोनों के बीच में नहीं हो सकती ?   हमारी ज्यादातर हिंदी कृतियों में स्त्री को देवतुल्य चित्रित किया गया है और शायद इसी कारणवश एक आम स्त्री के लिए उसपर खड़ा उतरना आसान नहीं है। हमारे समाज में पुरुष मनुष्य है परन्तु स्त्री देवी है। ऐसी देवी जो समाज के हर ज़हर को पी सक...
जोदि तोर डाक शुने केऊ न आसे  तबे एकला चलो रे। एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे!  जोदि केऊ कथा ना कोय, ओरे, ओरे, ओ अभागा,  जोदि सबाई थाके मुख फिराय, सबाई करे भय-  तबे परान खुले  ओ, तुई मुख फूटे तोर मनेर कथा एकला बोलो रे!  जोदि सबाई फिरे जाय, ओरे, ओरे, ओ अभागा,  जोदि गहन पथे जाबार काले केऊ फिरे न जाय-  तबे पथेर काँटा  ओ, तुई रक्तमाला चरन तले एकला दलो रे!  जोदि आलो ना घरे, ओरे, ओरे, ओ अभागा-  जोदि झड़ बादले आधार राते दुयार देय धरे-  तबे वज्रानले  आपुन बुकेर पांजर जालियेनिये एकला जलो रे!                                                                          - गुरुदेव रबिन्द्रनाथ टैगोर  यह एक ऐसी रचना है जिसका समय कभी भी खत्म नहीं होगा। जिस वक़्त यह लिखा गया उस समय भी इसका ...